तिनका तिनका जोड़कर जो बनाया था वो हमेशा सूना घर रहा,
दूर तक निकल गया था मंजिल की तलाश में मगर मुसाफिर था मुसाफिर रहा।

अपने ही रंगो से जुदा लगती हैं मेरे सपनों की तस्वीरें,
गुमनामी में डूबा हुआ मेरे सीने में एक बर्बाद शहर रहा।

मिल गई मंजिल उस राही को वो कभी लौटकर नहीं आया,
बहुत सिद्दत थी मेरे प्यार में मगर मेरा प्यार बेअसर रहा।

मिटा दिए उसने अपने दिल से मेरी यादों के नामो-निशां,
नहीं रोक पाया में उसे वो आज भी मेरी धड़कनों में सफर कर रहा।

मेरे सब्र की इम्तिहां न पूछों तूफान ढल जाने के बाद का मंजर देखा हैं मेने,
तन्हाई को सीने से लगा कर मैं काँटों भरी राहों से गुजर रहा।

परछाई भी नजर नहीं आती मुझे रात के सन्नाटे में,
क्या बताऊँ आपको कि मेरा केसा सफर रहा।

कब से ढून्ढ रहा हूँ मगर मुझे मेरी मंजिल का पता नहीं मिलता,
जो शख्स मुझे अपना सा लगता है क्यों उसके लिवास में मुझे वो नहीं मिलता,
घर बनाना चाहता हूँ उसके दिल में मगर उसके दिल का रास्ता नहीं मिलता।
ये पूरी कायनात भी मिलकर उसकी कमी पूरी नहीं कर सकती,
मेरे दर्द की इम्तिहान कैसे बयां करूँ रोने पर आँखों से आंशूं नहीं निकलता।

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