क्या अपने कभी सोचा है उस 7-8 साल के बच्चे के बारे में जो जून के महीने में तिलतिलाती धुप में जरुरत से ज्यादा रफ़्तार से दौड़ती गाड़ियों के बीचों बीच सिग्नल पै भीख मांग रहा होता है, कभी गौर से देखा है उस मासूम बच्चे के चेहरे को जो दिन रात भूख से लड़ रहा होता है। साहब आपके पास ये सब देखने और सोचने का टाइम कहाँ है, क्यों कि आपको अपनी जरूरतों और महत्वाकांक्षा के सिबाय कुछ नज़र नहीं आता। कभी फुटपाथ पै ठण्ड से ठिठुरते हुए उस यतीम बच्चे में अपने बच्चे को देखो तो सायद आपको उसका दर्द नज़र आजायेगा। कभी अपनी शान-ओ-सकत कि बुलंद इमारतों से नीचे उतरकर देखो तो सायद आपको भूख और बेबसी से मरते हुए हजारों बच्चे नज़र आ जाएंगे जिनका कोई कसूर नहीं है बेगुनाह होकर भी उनको इस दुनिया में आने की इतनी बड़ी सजा मिल रही है। में आपसे ये तो नहीं कहता कि आप अपनी ऐश-ओ-आराम कि जिंदगी छोड़कर उन बच्चों कि देख भल करो लेकिन जितना संभव है उतना ही कर दीजिये जितना पैसा आप मंदिरो और भगवान को ढूढ़ने में खर्च कर देते हैं जिसकी कोई जरुरत नहीं है और लाखो रुपये पार्टी में उड़ा देते हैं उसी में से थोड़ा सा निकल के उन बच्चों के लिए खर्च कर दीजिये जिससे कि कुछ मासूमों कि जान बचाई जा सके।

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