तलाश कर रहा हूँ खुद की शायद मैंने खुद को कहीं खो दिया है सालों से खुद से मिला नहीं हूँ रोज नये नये लोगों से मिलता हूँ ढेर सारी बातें करता हूँ पता नहीं कब से खुद की आवाज नहीं सुनी मैंने परछाइयों के पीछे भाग रहा हूँ में जिनका कोई बजूद ही नहीं है। सपनों का बोझ मुझे मुझसे मिलने कि इजाजत नहीं देता, कभी न पूरी होने वाली इच्छाओं ने मुझे एक मशीन बना दिया है जो सिर्फ काम करती है खुद की परवाह किये बिना। अब ठीक से नींद नहीं आती अच्छे से भूख नहीं लगती है वो हसीं वो ख़ुशी सब गुम हो गई हैं वो शरारतें जो लोगों को चिड़िया करती थी दोस्तों के साथ घंटों गप्पे मरना सब भूल सा गया हूँ घंटों तक अपनी माँ से बात करना उनकी रोज की कहानियां सुनना वो सब लगभग ख़त्म सा हो गया है जिससे मेरी पहचान होती थी अब जो में हूँ वो में नहीं हूँ अब तो मेरे लिबाश में कोई और रहता है जो अपनी जरूरतों और ख्वाबों का गुलाम है जो बिना थके बिना रुका दिन रात भागता रहता है अपने सपनो के पीछे। में देखना चाहता हूँ अपने उस चेहरे को जो छोटी छोटी चीजों से बहुत खुस रहता था, में सुनना चाहता हूँ उसे अक्सर गुनगुनाता रहता था और दोस्तों को शायरियाँ सुनता रहता था अपनी बचकानी हरकतों से दूसरों को हसाता रहता था ढून्ढ रहा हूँ उस मासूमियत को जिसके लोग दीवाने हो जाया करते थे। खोज रहा हूँ उस क्रिकेटर को जो मैच जीतने में अपनी पूरी जी-जान लगा दिया करता था जैसे भारत और पाकिस्तान का मैच हो रहा हो, न जाने कहाँ खो गया वो देश भक्त जो अपने देश की मिटटी के लिए अपनी जान कुर्बान करने की बात करता था। अपने गांव को चमन बनाने के सपने देखता था और इस देश से गरीबी मिटाने की बात करता था। न जाने कहा चला गया वो। काश कि फिर से मिल पाता में खुद से, सुनने को मिल जाये अपनी आवाज, देखने को मिल जाये वो अपना मासूम सा चेहरा जो मेरी ही आँखों से ओझल सा होता रहा है। ये केसा इत्तेफाक है में खुद से ही जुड़ा हूँ अपने ही बजूद को तलाश कर रहा हूँ और एक ऐसी जिंदगी जी रहा हूँ जिसका कोई मतलब नहीं है

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