साहेंब कुछ वक़्त खामोश हो के देखा लोग सच में भूल जाते हैं

उसने मुझे दिल से निकाला मुझे ये आज याद आया……

वो मेरे शहर में होती तो मुमकिन था इत्तेफाक से मिल जाते कभी,
बिछड़ कर किस शहर बसी है ये खबर भी नही,

रात के अंधेरे में तो हर कोई किसी को याद कर लेता है

सुबह उठते ही जिसकी याद आए मुहब्बत उसे कहते हैं।।

प्यास है या इक आग है, तेरी यादों का दर्द मेरी रूह को नही छोड़ता

मुहब्बत थी, मुहब्बत है, ये दिल तुमसे मुहब्बत करना नही छोड़ता।

गुनाह करने को अंधेरा नहीं होता काफी !

गुनाह करनें को कलेजा भी होना चाहिये !!

समय हर समय को बदल देता है

बस समय को थोड़ा समय चाहिए

मुझको मयस्सर हो तेरे लब की शराब ,
मैं उसको पी के हमेशा ही झूमता रहूँगा !!

कभी तो आ मेरे घर में, एे हुस्न ए मलिका,
मैं कब तलक तेरी तस्वीर चूमता रहूँगा !!

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