अच्छा हुआ कि तू रुखसत हो गया मुझसे, कुछ पल और तू मेरे साथ रहता तो तुझे मुझसे नफरत हो जाती और में ये बर्दाश्त नहीं कर पाता कि मेरे अलावा भी कोई मुझसे नफरत करे।

अच्छा हुआ कि तू अपने रास्ते चला गया, अगर कुछ दिन और मेरे साथ रहता तो शहीद हो जाता उस जंग में जिसे में लड़ रहा हूँ दिन रात, और में ये चाहता नहीं कि मेरी जंग में कोई बेगुनाह शहीद हो।

अच्छा हुआ कि तूने मुझसे कोई उम्मीद नहीं की, क्यों कि तुझे देने के लिए मेरे पास कुछ नहीं है शिबाय आँखों में आंशू और दिल में कांटे, और में ये गुनाह नहीं कर सकता कि किसी मासूम को मेरे काँटों की चुभन से आँखों में आंशू आये।

में गुनहगार हूँ तेरा क्यों कि में नहीं बन पाया अच्छा हमसफ़र, नहीं ला पाया चाँद तारे, नहीं चुरा पाया तुम्हारे लिए इंद्रधनुष से रंग, नहीं दे सका तुम्हें तुम्हारे हिस्से की ख़ुशी। में जनता हूँ कि मुझमे में ऐसी कोई बात नहीं जो तुम्हें अच्छी लगती है, बस तुम्हारा देखने का नजरिया अच्छा है जो मुझ जैसे इंसान में भी आपको अच्छाई नज़र आती है।

मेरी किस्मत इतनी अच्छी नहीं है कि तुम्हारे जैसा अनमोल इंसान मेरे हिस्से में आये। बहुत ख़ुशनहीब होगा वो शख्स जो तुम्हारा हमसफ़र होगा। में तो अँधेरे में भटकता हुआ मुसाफिर हूँ जिसे न रास्ता मालूम है न मंजिल मेरा अंजाम में नहीं जनता। में तो बुझते हुए चिराग का धुंआं हूँ जिसका कोई बजूद नहीं होता। खिजा की शाम हूँ में और तुम हो नहीं नई सुबह।

मुझे दफ़न होना है अंधेरों में, तुम्हारी रोशनी होगी हर जगह।।
……अलविदा।

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